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बुधवार, 12 जुलाई 2017

भारत दुर्दशा की संवेदना |भारतेंदु | bhartendu harshchand | नवजागरण |भारत दुर्दशा का कारण| bhart durdasha natak|

                      भारत दुर्दशा की संवेदना पर प्रकाश डालिए

मुख्यतः  नाटक का आरंभ भारतेंदु युग से माना जाता है। भारतेंदु से पूर्व खड़ी बोली की प्रधानता थी। गद्य के विकास में कलकत्ता के फोर्ट विलियम कॉलेज की महत्वपूर्ण भूमिका रही। भारतेंदु का काल नवजागरण के नाम से भी जाना जाता है। नवजागरण की विशेषता आत्मअवलोकन तथा स्वयंमूल्यांकन की थी। नवजागरण का कारण था सामूहिक चेतना , सांस्कृतिक चेतना। नाटक सामाजिक कला है। अतः नवजागरण काल में नाटक की अहम भूमिका थी।

नाटक को लेकर अभी भी विवाद है कि प्रथम नाटक कौन सा है 
आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार आनंद रघुनंदन ,
डॉक्टर दशरथ ओझा के अनुसार संदेशरासक और 
भारतेंदु के अनुसार नहुष  

हिंदी का प्रथम नाटक है। अतः भारतेंदु ने अपने नाटक में प्राचीन परंपरा और नवीनता का समावेश किया है। भारतेंदु ने 30 वर्ष की अल्प आयु में हिंदी साहित्य को नवीन दिशा प्रदान की , उनका काल 1850 से 1900  तक माना जाता है। उनके  
महत्वपूर्ण नाटक निम्नलिखित है-
अंधेर नगरी
भारत दुर्दशा
मुद्राराक्षस
सत्य हरिश्चंद्र
वैदिक हिंसा हिंसा न भवति
नीलदेवी आदि

भारत दुर्दशा भारतेंदु जी की सफल कृति  है इसका अंदाजा इसके मंचीयता  से लगाया जा सकता है। इस नाटक का सफल मंचन किया जा चुका है। यह नाटक आज भी दर्शकों को प्रभावित करने में सक्षम है। भारत दुर्दशा के सभी पात्र प्रतिकात्मक हैं उनके पात्र भारत दुर्देव , मदिरा लोभ , अहंकार , सत्यानाशी फौज आदि है।
भारतेंदु का यह नाटक अपनी यूगिन समस्याओं को उजागर करता है ,उसका समाधान करता है। भारत दुर्दशा में कवि ने अपने सामने प्रत्यक्ष दिखाई देने वाली वर्तमान लक्ष्यहीन पतन की ओर उन्मुख भारत का वर्णन किया है। नाटककार के लिए भारत की परतंत्रता  से ज्यादा भारतीय समाज की पतनोन्मुख ता सोचनीय है। भारतेंदु ऐसे समय में आए जब अंग्रेजी शासन और नवाबी राज्यों में हिंदुओं का सम्मान सुरक्षित नहीं था। उनका धर्म अपनी रक्षा के लिए तरस रहा तथा हिंदुओं ने अपने धर्म की रक्षा का कई प्रयत्न किया किंतु वह असफल रहा पूर्व का समय मुगलों का था जो मुस्लिम थे उन्होंने अपने धर्म का प्रचार प्रसार किया हिंदुओं का धर्म बलात परिवर्तन कराया गया ।
हिंदू स्त्रियों का गौरव भी संकटग्रस्त था अंग्रेजी राज ने इस संकट को दूर किया इसलिए कई स्थानों पर अंग्रेजी राज्य को भारत दुर्दशा में कई स्थानों पर एक सकारात्मक दृष्टि से भी देखा गया है -

"हे भगवती राजराजेश्वरी इसका हाथ पकड़ो"

डॉक्टर रामविलास शर्मा के अनुसार -
                                 "भारतेंदु ने अपने नाटक साहित्य के जरिए इतिहास ,पुराण और वर्तमान जीवन के विविध स्रोतों को नया आयाम प्रदान किया है। इतना ही नहीं उन्होंने अपने नाटकों के माध्यम से नई हिंदी को लोकप्रिय बनाया। पारसी रंगमंच का विशेष लोकप्रियता तथा प्राचीन नाटकों के उद्धार किया  गेआत्मक प्रस्तुतिकरण किया।'

बाबू गुलाब राय ने
                    'भारत दुर्दशा को दुखांत माना है भारत दुर्दशा नाटक के संबंध में आपत्ति की है कि वह दुखांत  है और इसमें आशा का कोई संदेश नहीं है , कवी  का उद्देश्य जागृति /उत्पन्न करना था व आशा और उत्साह द्वारा हो  चाहे करुणा के द्वारा।'

राम चंद्र शुक्ला ने
                'भारतेंदु को लल्लूलाल व इंशा अल्लाह खान की अगली पीढ़ी मान उसको उत्तराधिकारी माना है।'





भारत दुर्दशा का कारण

भारतेंदु ने भारत दुर्दशा का कारण सामाजिक विकृतियों को माना। लोगों में व्याप्त हालत व रूढ़िवादी सोच को माना है। लोगों के निराशावादी ,लक्ष्यहीन ,व  पत्तनों उन्मुखी सोच ,को भारतेंदु ने भारत दुर्दशा का कारण माना  व समाज में जो आर्थिक संरचना धार्मिक संरचना है वह समाज की नींव को  खोखली कर रही है। आपस में भेदभाव व जाति का  वर्गीकरण आपसी मनमुटाव स्वार्थ परखता ,लोग भारत की दुर्दशा का कारण है। भारत सदैव धार्मिक व अंधविश्वास की रूढ़ियों व परंपरा मान्यताओं से ग्रसित रहा है ,जिसके कारण एक धर्म दूसरे धर्म को नीचा दिखाने के लिए आपस में लड़ता रहा। जिसके कारण विदेशियों का भारत में आगमन हुआ और सारे विनाश का कारण बना।
" हरि वैदिक जैन डुबाई पुस्तक सारी ।
करी कलह बुलाई जवन सैन पुनि  भारी।।"

समाज का एक बड़ा तबका आलसी ,अशिक्षित वह कमजोर का है जो अपनी पुरानी सड़ी-गली मान्यता को ढो  रहा  है। वह अपने तक ही केंद्रित है दूसरा वर्ग इस समाज का निरंतर शोषण करता रहा है। किंतु यह उस परंपरा का विरोध नहीं करते वह निराशावादी वह भाग्यवादी होते जा रहे हैं। यही  कारण है कि कुमति व आलस का वर्चस्व समाज में बढ़ते जा रहा है-

" तीन नासी बुद्धि बल विद्या ,धन बहू बारी ।
छाई अब आलस -कुमति -कलह -अंधियारी ।।
भय अंध पंगु सब दीन-हीन बिखलाई ।
हा! हा !भारत दुर्दशा ना देखी जाई।।

भारतेंदु जी को निराशा होती है समाज के भाग्यवादी व लक्ष्यहीन पतनशीलता की ओर अग्रसर प्रगति पर। वह समाज को अपने भविष्य के गौरव की ओर इशारा करते हैं कि अपने यहां अर्जुन ,कृष्ण ,भीम , आदि जैसे पराक्रमी शूरवीर योद्धा हुए और आज उस समाज की यह दुर्दशा! समाज में भारतेंदु ने तब अपनी आवाज बुलंद की जब समाज  ने सती प्रथा , बाल विवाह  ,गौ हत्या , आदि जैसी बड़ी आपदाओं ने अपने जड़ पसार लिए थे। भारतेंदु ने इस परंपरा मान्यता का खंडन किया भारत दुर्दशा का कारण जहां धर्म , कर्म - काण्डीय  रहा वही सबसे बड़ा कारण आलस्य ,असंतोष भी रहा। मदिरा ,अंधकार ने  भी भारत को पर्याप्त मात्रा में दुर्दशा की ओर किया। सभी लोग मदिरा के प्रेमी हो गए देश के सभी लोग चाहे अफसर हो वकील हो सभी मदिरा का सेवन करते उसके प्रभाव से कोई भी नहीं बच सका भारतेंदु व्यंग करते हैं-
"मदवा पीले पागल जीवन बित्यो जाए ।
बिनु मद जगत सार कुछ नहीं मान मेरी बात।"

अंग्रेजी राज की समीक्षा

                         भारतेंदु ने जगह-जगह पर अंग्रेजी राज की विवेचना की है क्योकि अंग्रेजी राज के  आने से सती प्रथा , बाल विवाह आदि जैसी कुरीतियों का सफाया हो सका। शिक्षा  का प्रकाश भी पश्चिम से ही आया। अतः भारतेंदु ने कई स्थानों पर अंग्रेजी राज को भारत का हितकर भी माना-

" हाय भारत भैया उठो देखो विद्या का सूर्य पश्चिम से उदय हुआ चला आता है अब सोने का समय नहीं है। 


किंतु भारतेन्दु  ने उनकी निंदा भी की ,उनके विचारों व मान्यताओं का खंडन भी किया। अंग्रेज अपने हितकर नहीं है वह एक लूट के उद्देश्य से भारत में आए ,यहां का कच्चा माल अपने देश ले जाकर वहां से उनका महंगे दामों में सौदा किया। भारतीय किसानों पर  रीड तोड़ने वाला लगान लादा। गया यहां की जनता पर निरंतर अत्याचार किया गया -

"अंग्रेज राज सुख साज सजे सब भारी 
पै धन विदेस  चलि जात यह अति ख्वारी 
ताहू पर महंगी काल रोग विस्तारी 
दिन दिन दुख  इस देत  हा हा री 
सब के ऊपर टिक्क्स  की आफत आई 
हा हा भारत दुर्दशा न देखी जाई  "।। 

अतः भारतेंदु ने अपने आलोचकों का प्रतिरोध किया जो उन पर अंग्रेज का प्रशंसक होने का आरोप लगा रहे थे। 

इतिहास व पौराणिक मान्यताओं का बोध

भारतेंदु ने समाज को जागरुक करने के लिए इतिहास , पुराण का सहारा लिया। उनके आलोक से समाज को परिचित कराया।  भारतेंदु ने अपने कुछ नाटकों की रचना तो पुराणों के आधार पर किया तो कुछ नाटकों की रचना इतिहास के आधार पर। भारत - दुर्दशा भारतेंदु का मौलिक नाटक है, किंतु इसमें भी पौराणिक व ऐतिहासिक तथ्य समाहित है। भारतेंदु अतीत के गौरव से समाज के पराजित मनोवृति को सहला रहे थे। 


सबके पाहिले  जेहि  ईश्वर धन - बल दीनो।  
सबके पहले जेहि  सभ्य विधाता कीन्हो।।


भारत - दुर्दशा में पुराण को भी आधार बनाकर समाज को जागरुक किया। उन्होंने राम ,युधिष्ठिर ,भीष्म ,भीम ,कर्ण , अर्जुन , कृष्ण आदि की भी मिसाल पेश की कि वह हमारे अतीत में अपने पराक्रम की पताका फैला रहे थे ,जो भारत कभी ईश्वर का प्रिय था सोने की चिड़िया थी आज वहां की यह दुर्दशा।
अतः भारतेंदु ने इतिहास पुराण आदि का सहारा लेकर समाज को जागरुक करने के का सार्थक प्रयत्न किया यही से स्वतंत्रता की नींव पड़ी जो एक चिंगारी का रूप धारण कर लोगों के बीच आग जलाने का कार्य कर रही थी।


समाधान संकेत
भारतेंदु ने भारत - दुर्दशा में प्रतिकात्मक पात्रों की सहायता से दुर्दशा के कारणों की खोज की ,पहचान किया। जिसमें सबसे बड़ा कारण मदिरा , लोभ , अशिक्षा को माना उसकी पहचान कर भारतेंदु ने उसका साथ छोड़ने का आग्रह किया। यह सभी वास्तव में आज समाज की जड़ें खोखली करने में अहम भूमिका निभा रही है। भारतेंदु ने जगह-जगह मदिरा व निर्लज्जता के माध्यम से समाज में एक निश्चित ही सार्थक संदेश दिया जो सर्वनाश का कारण है। उसके साथ न जाने का आग्रह किया। समाज में असंतोष ,लज्जा ,मदिरा दुर्देव  आदि ने अपनी जड़ें इतनी जमा रखी है कि भारत भाग्य अपनी तमाम कोशिशों के बाद भी सफल नहीं हो पाता और अंत में कटार मारकर आत्महत्या कर लेता है। 


निष्कर्ष

तो हम कह सकते हैं कि भारत दुर्दशा भारतेंदु युग का दस्तावेज है इसमें वर्तमान सामाजिक ,राजनीतिक व आर्थिक स्थिति स्पष्ट रूप से वर्णित है। यह नाटक भारतीय संवेदना को व्यक्त करने में सफल रही है नवजागरण के दौर में भारत दुर्दशा ने एक मशाल की भूमिका निभाई जिसमें भारतीयों की लक्ष्यहीन पतन मुखी सोच को नई दिशा प्रदान की। 





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मंगलवार, 30 मई 2017

रस के अंग और भेद | रसराज | संयोग श्रृंगार

                                      रस के अंग और भेद

1 श्रृंगार रस
            श्रृंगार रस को रसराज माना गया है ,  क्योंकि यह अत्यंत व्यापक रहा है श्रृंगार शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है श्रृंग + आर ।  'श्रृंग' का अर्थ है "कामोद्रेक" ,  'आर' का अर्थ है वृद्धि प्राप्ती अतः श्रृंगार का अर्थ हुआ कामोद्रेक की प्राप्ति या विधि श्रृंगार रस का स्थाई भाव दांपत्य प्रेम है । पति-पत्नी या प्रेमी-प्रेमिका कि प्रेम की  अभिव्यंजना की श्रृंगार रस की विषय वस्तु है प्राचीन आचार्यों ने स्त्री पुरुष के शुद्ध प्रेम को ही रति कहां है।
इस परकीया प्रिया - चित्रण रस ना कहलाकर रस आभास कहलायेगा श्रृंगार रस में इस बात का भी ध्यान रखना आवश्यक है कि उसमें अश्लीलता का समावेश न होने पाए। श्रृंगार रस के संयोग और वियोग दो प्रमुख भेद होते हैं इन दोनों के अंतर्गत जीवन के न जाने कितने क्रियाकलाप सुख कारण का  भाव वेदनाएं स्थान पाते हैं इसको विस्थापन की कोई सीमा नहीं है इसी कारण ही इसे रसराज कहा जाता है जो प्रेम जीवन के संघर्षों में खेलता है कष्टों में पलता है जिसमें प्रिय के प्रति मंगलकामनाएं प्रकट होती है  वह प्रेम ही उदास श्रृंगार रस का विषय बनता है ।
श्रृंगार रस को निम्न उदाहरण के द्वारा भी प्रस्तुत किया जा सकता है -

1 संयोग श्रृंगार -
               संयोग श्रृंगार वहां होता है जहां नायक-नायिका की मिलन अवस्था का चित्रण किया जाता है।
उदाहरण :-
'में निज आलिन्द में खड़ी थी सखी एक रात,
रिमझिम बूंदें पढ़ती थी घटा छाई थी ,
गमक रही थी केतकी की गंध ,
चारों और झिल्ली झनकार ,
वही मेरे मन भाई थी। '
--------------------------------------------------------------
चौक देखा ! मैंने चुप कोने में खड़े थे प्रिय ,
माई मुख लज्जा उसी छाती में छुपाई थी।
                                                     साकेत
यहां पर 

आश्रय                उर्मिला
आलंबन              लक्ष्मण
स्थाई भाव            रति (प्रेम )
उद्दीपन                केतकी की गंध
                          रिमझिम बरसा
                          झिल्ली की झंकार
                          बिजली का चमकना आदि
संचारी                 हर्ष, धैर्य,लज्जा ,रोमांच,
अनुभाव              नुपुर का बजना
                         छाती से लगा लेना आदि।
इस प्रकार यह संयोग श्रृंगार का पूर्ण परिपाक है।

वियोग श्रृंगार 

                  वियोग श्रृंगार वहां होता है जहां नायक-नायिका में परस्पर प्रेम होने पर भी मिलन संभव नहीं हो पाता प्राचीन काव्य शास्त्र ने वियोग के चार भाग किए हैं :-

1 पूर्व राग                     पहले का आकर्षण
2 मान                          रूठना
3 प्रवास                       छोड़कर जाना
4 करुण विप्रलंभ            मरने से पूर्व की करुणा ।
पूर्व राग
         पूर्व राग मे विवाह या मिलन से पूर्व का जो आकर्षण होता है जैसे रामचरितमानस में पुष्प वाटिका का प्रसंग ।
मान
     आशा के प्रतिकूल बात होने पर जब स्वाभिमान जागृत होता है तब मान की दशा होती है जैसे कृष्ण का दूसरे गोपियों के साथ रास रचाना और उनपर राधा का रूठना।

प्रवास
         वियोग की पूर्वअवस्था प्रिय के प्रवास पर ही होती है और विशेष रूप से जब आने की भाषा होती है और वह नहीं आता तो वियोग और गहरा हो जाता है ।
मानस मंदिर में सती , पति की प्रतिमा थाम ,
चलती सी उस विरह में बनी आरती आप ,
आंखों में प्रिय मिलती थी ,
भूले थे सब भोग हुआ विषम से भी अधिक उसका विषम व योग ।
यहां
आश्रय                            उर्मिला
आलंबन                          प्रवास रत लक्ष्मण
उद्दीपन                           आंखों में प्रियतम की मूर्ति
अनुभाव                          भोगों का परित्याग
                                     स्वामी का ध्यान
संचारी                            स्मृति ,जड़ता ,धैर्य ,आदि ।
इन सब के संयोग से लक्ष्मण विषय रति भाव वियोग रस में परिणीत हुआ है ।




 करुण विप्रलंभ

               करुण विप्रलंभ वहां होता है जहां प्रेमी या प्रेमिका में से किसी एक दिवंगत होने की पूरी संभावना पर भी जीवित होने की आशा बची रहती है|  जिसमें अपने प्रिय के प्रति हृदय में करुणा से भरी शोक धारा प्रवाहित होती है और मिलन की आशा बनी रहती है |

2  हास्य रस

          हास्य रस का स्थाई भाव  ' हास्य 'है साहित्य में हास्य रस का निरूपण बहुत ही कठिन कार्य होता है क्योंकि थोड़ी सी असावधानी से हास्य फूहड़ मजाक में बदल कर रह जाता है ।  हास्य रस के लिए उक्ति व्यंग्यात्मक होना चाहिए हास्य और व्यंग्य दोनों में अंतर है दोनों का आलंबन विकृत या अनुचित होता है लेकिन हास्य  हमें जहां आता है वही खिलखिला  देते हैं लेकिन जहां व्यंग्य आता है वहां चुभता है और सोचने पर विवश करता है ।


'अपने यहां संसद तेली की वह धानी जिसमें आधा तेल है और आधा पानी,
 दरअसल अपने यहां जनतंत्र एक ऐसा तमाशा है जिसकी जान मदारी की भाषा है।।'



  यहाँ

आश्रय                     पाठक और श्रोता गण है
आलंबन                   संसद ,जनतंत्र का तमाशा
अनुभाव                    वर्तमान स्थिति और         उसकी                    विडंबना कहीं जा सकती है।

3  करुण रस 

              भवभूति करूण रस को एक मात्र रस मानते थे । एकोरसः करुण मानते थे वह करुण रस के दो भेद करते हैं
1 स्वनिष्ठ 
2 परनिष्ठ

 करुण रस में हृदय द्रवित हो कर स्वयं उन्नत हो जाता है  भावनाओं का ऐसा  परीसपाद होता है कि अन्य रस तरंग किया बुलबुले के समान बहने लगते हैं इसका स्थाई भाव ' शौक 'है करुण रस लीन मग्न होकर हमारी मनोवृत्तियों स्वच्छ होकर निर्मल हो जाती है।

 उदाहरण 

 मेरे हृदय के हर्ष हा!अभिमन्यु अब तू है कहां ,
दृग खोलकर बेटा तनिक तो देख हम सब को यहां मामा खड़े हैं पास तेरे तू यहीं पर है पड़ा ।।

 यहां पर 
स्थाई भाव                      शौक 
आश्रय                           द्रोपदी है 
आलंबन                        अभिमन्यु 
उद्दीपन                           मृत शरीर 
अनुभाव                        अभिमन्यु को आंख खोलकर देखने के लिए कहना ,गुरुजनों का मान रखना ,स्मृति, आवेग, जड़ता।

 इस प्रकार विभाव अनुभाव संचारी भाव के करुण रस का सुंदर भाव प्रकट हुआ है ।


4  वीर रस 

       समाजिकों के हृदय में वासना रुप से विद्यमान उत्साह स्थाई भाव काव्यों आदि में वर्णित विभाव अनुभाव संचारी भाव के संयोग से जब रस अवस्था में पहुंचकर आस्वाद योग्य बन जाता है तब वह वीर रस कहलाता है । इसकी मुख्यता चार प्रवृत्ति है 

1 दयावीर 
        दयावीर भाव की अभिव्यक्ति वहां होती है जहां कोई व्यक्ति किसी दिन दुखी पीड़ित जन को देखकर उसकी सहायता करने में लीन हो जाता है । जैसे - 

' देखि सुदामा की दीन दशा करुण करके करूणानिधि रोए ' ।

2  दानवीर 
         इसके आलंबन में दान प्राप्त करने की योग्यता का होना अनिवार्य है

' क्षमा बड़न को चाहिए छोटन को उत्पात का रहीम हरि को गए जो भिक्षु मारी लात  ' ।



धर्मवीर 
               इसके स्थाई भाव में धर्म स्थापना का उद्देश्य प्रमुख होता है दूसरों से धर्म की महत्ता का ज्ञान प्राप्त करना अपनी टेक (प्रतिक्रिया ) का पालन करना इस में प्रमुख रुप से व्याप्त होता है।  

4 युद्धवीर 
           काव्य में सबसे अधिक महत्व युद्धवीर का है लोक में  भी वीर रस से तात्पर्य युद्धवीर से ही लिया जाता है इसका स्थाई भाव 'शत्रुनाशक उत्साह ' है 

मैं सच कहता हूं सखे ,सुकुमार मत जानो मुझे,
 यमराज से भी युद्ध को प्रस्तुत सदा जानो मुझे ,
है और उनकी बात क्या गर्व मैं करता नहीं ,
मामा और निजी ताज से भी समर में डरता नहीं।।

 यह उक्ति अभिमन्यु ने अपने साथी को युद्ध भूमि में कही है।

 यहां 

आलंबन                          गौरव 
विभाव                     द्रोणाचार्य द्वारा चक्रव्यूह रचना
उद्दीपन विभाव            अर्जुन की अनुपस्थिति 
अनुभाव           अभिमन्यु का उत्साह पूर्ण का वाक्य संचारी भाव        हर्ष ,गर्व ,घृत ,आदि।

 इन सभी के संयोग से उत्साह नामक स्थाई भाव वीर रस में परिपक्व हुआ है।

5 भयानक रस 

               विभाव , अनुभाव एवं संचारी भावों के प्रयोग से जब सर्व हृदय समाजिक के हृदय में विद्यमान है स्थाई भाव उत्पन्न हो कर या प्रकट होकर रस में परिणत हो जाता है तब वह भयानक रस होता है वह की  वृत्ति बहुत व्यापक होती है यह केवल मनुष्य में ही नहीं समस्त प्राणी जगत में व्याप्त है।

 एक और अजगरही लाखी एक और मृगराही 
विकट बटोही बीच ही परयो मूरछा खाई ।।

 यहां 
आलंबन                     अजगर और शेर 
विभाव                        उनकी चेष्टाएं 
उद्दीपन विभाव              बटोही 
आश्रय                          मूरछा 
अनुभाव संचारी भाव       त्रास, विशद् आदी 

इन सभी के सहयोग से भयानक स्थाई भाव भयानक रस में परिणत हुआ है ।

6   रौद्र रस 

            इसका स्थाई भाव क्रोध है विभाव अनुभाव और संचारी भावों के सहयोग से वासना रूप में समाजिक के हृदय में स्थित क्रोध स्थाई भाव आस्वादित होता हुआ रोद्र रस में परिणत हो जाता है ।

 श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्षोभ से जलने लगे ।
सब शोक अपना भूलकर तल युगल मलने लगे ।
संसार देखें अब हमारे शत्रु रण में मृत पड़े ।
 करते हुए यह घोषणा वह हो गए उठ खड़े ।।

 यहां 
आलंबन             अभिमन्यु के वध पर कपटी, दुराचारी       अन्याय को रोका हर्ष प्रकट करना है 
उद्दीपन               श्री कृष्ण के वचन 
अनुभाव              अर्जुन के  वाक्य क्षोब से जलना     आंखें लाल होना हाथों को मला आदि 
संचारी भाव         उग्रता, आवेद ,चपलता ,आदि के संयोग से रोद्र रस की व्यंजना है।।



7 वीभत्स रस

                घृणित वस्तुओं को देखकर या सुनकर जुगुप्सा नामक स्थाई भाव जब विभाव अनुभाव संचारी भावों के सहयोग से परिपक्व अवस्था में पहुंच जाता है तो विभत्स रस में परिणत हो जाता है इसे रसों में शामिल करने का कारण तीव्र वह तुरंत रूप से प्रभावित करने की शक्ति है वैसे श्रृंगार रस हास्य रसों का आनंद विभत्स रस के द्वारा ही लिया जा सकता है ।

 नाट्यशास्त्र के आधार पर आचार्य विश्वनाथ की निम्न पंक्तियों पंक्तियां आज तक विभत्स रस का स्वरूप या लक्षण बताने में प्रयुक्त होती रही है । विभत्स रस उसे कहते हैं जिसका स्थाई भाव जुगुप्सा । वारीनील इसके आलंबन दुर्गंध में मांस रक्त है  इनमें कीड़े पड़ना ही उसका उद्दीपन माना जा सकता है । और मोह आवेग व्याधि ,मरण ,आदि व्यभिचारी भाव है । विभत्स रस में अनुभाव की कोई सीमा नहीं है । वाचित अनुभाव के रूप में छिँछी की ध्वनि अपशब्द निंदा करना आदि कायिक अनुभावों में नाक -भौं चढ़ाना , थूकना ,आंखें बंद करना, कान पर हाथ रखना ,ठोकर मारना ,आदि की गणना की जा सकती है। 

 प्रेमचंद जैसे सामाजिक साहित्यकारों को विसंगतियों के प्रति वीजभाव घृणा हीन है । आधुनिक साहित्य में इसका खूब चित्रण हुआ है । क्योंकि यह जीवन निर्माण की अद्भुत शक्ति रखता है ।

 रक्तबीज सौ अधर्मी आयो 
रणदल जोड़ के सूर क्रोध आयो 
 अस्त्र-शस्त्र सजाए के योग नींद को रक्त पिलायो अंतरिक्ष में पठाए के महामूढ  निस्तंभ योद्धा ठानों है खड़ग।।

 प्रस्तुत उदहारण में गुरु गोविंद सिंह प्रति चंडी चरित्र में युद्ध का दृश्य वर्णित है जिसमें रक्तबीज को मारने के लिए स्वयं शक्ति ने अनेकानेक योगिनियां का रूद्र धारण कर लिया है युद्ध भूमि का सजीव चित्रण होने के बाद यहां वीभत्स रस की व्यंजना है ।

8  अद्भुत रस

                  अद्भुत रस का स्थाई भाव विस्मय  है विस्मय में मानव की आदिम प्रवृत्ति है खेल - तमाशे या पूरे कला कौशल से उत्पन्न विस्मय में उदात  भाव हो सकता है परंतु रस नहीं हो सकता । अद्भुत रसों का व्यापक वर्णन हमारे साहित्य में हुआ है लेकिन हम उसे रस के स्थान पर आदि शब्दों का प्रयोग कर छोड़ देते हैं ऐसी शूक्तियां और व्यंजना है जिसमे चमत्कार प्रधान होता है वह सीधे अद्भुत रस से संबंध है ।

 उदाहरण 
अखिल भुवन चर अचर सब हरि
 मुख में लखी मांतो 
चकित  भई गदगद वचन 
विकसित दृग कूल काव ।।

 अतः अद्भूत अदभुत रस विस्मयकारी घटनाओं वस्तुओं व्यक्तियों तथा उनके चमत्कार को क्रियाकलापों के आलंबन से प्रकट होता है उनके अद्भुत व्यापार घटनाएं परिस्थितियां उद्दीपन बनती है आंखें खुली रह जाना एक टक देखना प्रसन्न होना रोंगटे खड़े हो जाना कंपन स्वेद ही अनुभाव सहज ही प्रकट होते हैं ।  उत्सुकता , जिज्ञासा ,आवेग , भ्रम, हर्ष, मति,गर्व, जड़ता ,धैर्य , आशंका ,चिंता , अनेक संचारी भाव से धारण कर अद्भुत उदास रूप धारण कर  अद्भुत रस में परिणत हो जाता है ।

9  शांत रस 

             शांत रस की उत्पत्ति तत्वभाव और वैराग्य से होती है इसका स्थाई भाव निर्वेद है विभाव अनुभाव व संचारी भावों से संयोग से हृदय में विद्यमान निर्वेद स्थाई भाव स्पष्ट होकर शांत रस में परिणत हो जाता है ।  आनंद वर्धन ने तृष्णा और सुख को शांत रस का स्थाई भाव बताया है । वैराग्य की आध्यात्मिक भावना शांत रस का विषय है । संसार की अस्वता मृत्यु जरा को आदि इसके आलंबन होते हैं जीवन की अमित्यता का अनुभाव सत्संग धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन श्रवण आदि उद्दीपन विभाव है और संयम स्वार्थ त्याग सत्संग गृहत्याग स्वाध्याय आत्म चिंतन आदि अनुभाव कहे जा सकते हैं । शांत रस के संचारी में मति ग्लानि, घृणा ,हर्ष , स्मृति ,संयोग ,विश्वास ,आशा दैन्य आदि की परिगणना की जा सकती है ।
भारत में कवि मानव  महात्मा बुद्ध , दयानंद , विवेकानंद ,आदि की समष्टि साधना और परमार्थ भावना शांत रस की रसानुभूति होती है । इसमें आध्यात्मिक शांति का सबसे ज्यादा महत्व है जो ना केवल वैराग्य को प्रकट करता है अपितु जीवन में संतोष की सृष्टि भी करता है ।
प्रचनन रोग से प्रकट हो संयोग मात्र भारी वियोग हाँ लोभ -मोह मे लीन लोग भूले है अपना परिनाम 
ओ क्षण ....................................राम राम ।।

जब सिद्धार्थ घट छोडकर वन मे जाते है तो वह संसार को सम्बन्धित करते हुए उससे विदा माँगते है । संबोधित करते हुए उससे विदा मांगते हैं , इन पंक्तियों में सिद्धार्थ निर्वेद स्थाई भाव का आश्रय  यह संसार ही इसका आलंबन है संसार की क्षणभंगुरता का ज्ञान उद्दीपन है |  संसार को संबोधित करना घर छोड़कर भागने को कहना और संसार से विरक्ति भाव आदी  अनुभाव है |  दैनिय , धर्म , रोमांच आदि संचारी भाव है | यहां शांत रस का सुंदर परिपाक है क्योंकि शांत रस वस्तुतः ऐसे मानसिक स्तूती  है जिसमें व्यक्ति समस्त संसार को सुखी और आनंदमय देखना चाहता है |

10  वात्सल्य रस 

वात्सल्य रस का आलंबन आधुनिक आचार्यों की देन है |  सूरदास ने अपने काव्य में वात्सल्य भाव का सुंदर विवेचन किया और इसके बाद इसे अंतिम रूप से रस स्वीकार कर लिया गया | आचार्य विश्वनाथ ने वात्सल्य की स्वतंत्र रूप में प्रतिष्ठा तो की परंतु इसे ज्ञापल स्वीकृति सूर , तुलसी आदि  भक्ति में काल के कवियों द्वारा ही प्रदान की गई | 
 वात्सल्य रस का स्थाई भाव वत्सल है | बच्चों की तोतली बोली , उनकी किलकारियां , मनभावन खेल अनेक प्रकार की लीलाएं इसका उद्दीपन है | माता-पिता का बच्चों पर बलिहारी जाना , आनंदित होना , हंसना उन्हें आशीष देना आदि इसके अनुभाव कहे जा सकते हैं |  आवेद , तीव्रता , जड़ता ,रोमांच ,स्वेद, आदि संचारी भाव है | इसमें वात्सल्य रस के दो भेद किए गए हैं
१ संयोग वात्सल्य 
२ वियोग वात्सल्य


11 भक्ति रस 
              संस्कृत साहित्य में व्यक्ति की स्वतंत्र रूप से नहीं है | किंतु बाद में मध्यकालीन भक्त कवियों की भक्ति भावना देखते हुए इसे स्वतंत्र रस के रूप में व्यंजित किया गया | इस रस का संबंध मानव के उच्च नैतिक आध्यात्मिक से है | इसका स्थाई भाव ईश्वर के प्रति रति या प्रेम है भगवान के प्रति पुण्य भाव श्रवण , सत्संग कृपा ,दया आदि उद्दीपन विभाव है|  अनुभाव के रूप में सेवा अर्चना कीर्तन वंदना गुणगान प्रशंसा आदि के लिए किए जा सकते हैं अनेक प्रकार के कायिक , वाच्य ,आहार ,  जैसे आंसू , रोमांच , स्वेद , आदि अनुभाव कहे जा सकते हैं | संचारी रूप में हर्ष , आशा , गर्व , स्तुति ,धैर्य संतोष आदि अनेक भाव संचरण करते हैं इसमें आलंबन ईश्वर और आश्रय उस ईश्वर के प्रेम के अनुरूप मन है | 







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